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डीएसएम

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परिचय : मांग पक्ष प्रबंधन (डीएसएम)

मांग पक्ष प्रबंधन (डीएसएम) को पारंपरिक तौर पर निरंतर विकास सुनिश्चित करते हुए ऊर्जा की मांग में कमी को प्राप्त करने के तौर पर मान्‍यता दी जाती है। हाल के दिनों में, डीएसएम को अभूतपूर्व महत्व प्राप्त हुआ है और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने के लिए यह लगभग सभी केंद्रीय और राज्य मिशनों का एक अभिन्न अंग बन गया है। डीएसएम के हस्तक्षेप से न केवल बिजली की पीक मांग को कम करने के लिए उपयोगिताओं में मदद मिली है, बल्कि यह उत्‍पादन, पारेषण और वितरण नेटवर्क में उच्च निवेश को टालने के लिए भी सहायक है।

कृषि मांग पक्ष प्रबंधन

यह कार्यक्रम समग्र बिजली की खपत में कमी, भूजल निष्कर्षण की क्षमता में सुधार, राज्य उपयोगिताओं पर सब्सिडी के बोझ को कम करने और बिजली के संयंत्रों में निवेश क्षमता से कम करके कृषि मांग पक्ष प्रबंधन के माध्यम से ऊर्जा दक्षता का वादा करता है। देश के 70 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार कृषि पर निर्भर हैं। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है क्योंकि इससे सकल घरेलू उत्‍पाद में लगभग 17% का योगदान मिलता है और यह 60% से अधिक आबादी को रोजगार प्रदान करता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कृषि क्षेत्र में 2.1 करोड़ से अधिक पंप सेट स्थापित किए गए हैं, जिनमें से अधिकांश पंप सेट अक्षम हैं। आंकड़े बताते हैं कि सेक्टर में हर साल 2.5 से 5 लाख नए पंप सेट कनेक्शन जोड़े जाते हैं। भारत में कृषि पंपों की औसत क्षमता लगभग 5 एचपी है और दक्षता का स्तर 25-30% है।

विभिन्न डिस्‍कॉम के सहयोग से बीईई ने महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में चार प्रायोगिक एजीडीएसएम परियोजनाओं को लागू किया।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) के बीच ऊर्जा दक्ष पंप सेट और परिचालन प्रथाओं के लिए जागरूकता पैदा करने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए ताकि जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से ऊर्जा और संसाधन दक्ष दृष्टिकोण अपनाए जा सकें। कृषि प्रथाओं में ऊर्जा दक्षता और संरक्षण पर, विशेष रूप से कृषि पंपसेट, ट्रैक्टर और अन्य मशीनों का उपयोग करने और ईंधन और जल संसाधन उपयोग दक्षता में सुधार करने के लिए जिससे खेती की लागत कम हो सके ताकि "प्रति बूंद अधिक फसल" और "किसानों की आय दोगुनी की जा सके" की कार्यनीति के साथ किसान की आय में वृद्धि हो सके।

नगरपालिका मांग पक्ष प्रबंधन (एमयूडीएसएम):

बढ़ती जनसंख्या और जनसंख्या के जीवन स्तर में सुधार के कारण सार्वजनिक उपयोगिताओं की बढ़ती मांग से शहरी निकायों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के लिए ऊर्जा की मांग में वृद्धि हुई है। नगरपालिका क्षेत्र / शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबीएस) स्ट्रीट लाइटिंग, पानी की पंपिंग, सीवेज ट्रीटमेंट और विभिन्न सार्वजनिक भवनों जैसी विभिन्न उपयोगिता सेवाओं के लिए बिजली की खपत होती है। वर्तमान में लगभग 30% भारतीय आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है और ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार होने वाले पलायन से शहरी स्थानीय निकायों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है।

नगरपालिका क्षेत्र में ऊर्जा की खपत में लगातार बदलावाव आता है और सुबह के समय तथा शाम के समय सड़क पर प्रकाश व्यवस्था और पानी की पंपिंग के कारण बिजली लोड बढ़ता है। ऊर्जा दक्षता प्रौद्योगिकी और मांग पक्ष प्रबंधन (डीएसएम) की पहल के सीमित प्रसार के कारण बिजली के अदक्ष उपयोग से नगरपालिकाओं के ऊर्जा खर्च में काफी वृद्धि हुई है। नगरपालिका मांग पक्ष प्रबंधन (एमयूडीएसएम) कार्यक्रम शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबीएस) की समग्र ऊर्जा दक्षता में सुधार कर सकता है, जिससे बिजली की खपत में काफी बचत हो सकती है, जिससे शहरी स्थानीय निकायों के लिए लागत में कमी / बचत हो सकती है।
नगरपालिका क्षेत्र में अपार ऊर्जा बचत क्षमता की पहचान करते हुए, बीईई ने ग्यारहवीं योजना के दौरान नगरपालिका मांग पक्ष प्रबंधन (एमयूडीएसएम) की शुरुआत की। परियोजना का मूल उद्देश्य शहरी स्थानीय निकायों की समग्र ऊर्जा दक्षता में सुधार करना है, जिससे बिजली की खपत में काफी बचत हो सकती है, जिससे शहरी स्थानीय निकायों के लिए लागत में कमी / बचत हो सकती है। ग्यारहवीं योजना के दौरान, 23 राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों को कवर करते हुए 2007 में नगर निगम क्षेत्र में स्थिति विश्लेषण किया गया था। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने देश में 175 नगरपालिकाओं को कवर करने के लिए ऊर्जा परीक्षण आयोजित करने के जरिए एक कार्यक्रम शुरू किया है और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की और एस्‍को मोड के माध्यम से कार्यान्वयन किया है।